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Monday, October 19, 2009

पाँच त्यौहारों से युक्त दीपावली

धनतेरस : दीपावली से दो दिन पूर्व "कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी" धनतेरस कहलाती है। धन की देवी लक्ष्मी का इस तिथि से अटूट संबंध है। इस दिन चाँदी के बर्तन, सिक्के व आभूषणादि खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है।
इस दिन सायंकाल में यमराज की प्रसन्नता के लिए घर के मुख्य दरवाजे पर दीपक जलाया जाता है। यमराज मृत्यु के देवता हैं और इस दिन दीपक जलाने से वे प्रसन्न होते हैं। इस पर्व के महत्व को बताते हुए यमराज ने स्वयं कहा है -
"कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे। यमदीपं बहिर्दद्यादमपमृत्युर्विनश्यति।।"
अर्थात् कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी को जो सायंकाल में दीपदान करेगा उसकी अकाल मृत्यु नहीं होगी।
धनतेरस को भगवान धन्वन्तरि का भी अवतार हुआ था। धन्वन्तरि देव सृष्टि के सर्वप्रथम चिकित्सक होने के नाते चिकित्सक वर्ग के प्रमुख आराध्य देव हैं। चिकित्सक वर्ग इस दिन धन्वन्तरि देव की पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी सफलता के लिए आशीर्वाद की याचना करते हैं तथा प्रसाद लेकर जनता के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते हैं। भगवान धन्वन्तरि को औषध अवतार भी माना जाता है क्योंकि ये औषधियों को लेकर ही प्रकट हुए थे। प्रकृति में व्याप्त समस्त औषधियों का इन्हें संपूर्ण ज्ञान था जिसे समय-समय पर इन्होंने सत्पात्रों को प्रदान किया।
नरक चतुर्दशी: इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं। लक्ष्मी जी की ब़डी बहिन अलक्ष्मी या दरिद्रा इस दिन प्रकट हुईं थीं। पुराणों के अनुसार कार्तिक मास में शरीर पर तेल मालिश नहीं की जाती परंतु इस दिन तेल की मालिश करके स्नान करना शुभ बताया है क्योंकि इससे अलक्ष्मी का प्रभाव नहीं प़डता और दरिद्रता दूर रहती है।
अपामार्ग पौधे की पत्तों से युक्त डाली को अपने सिर पर घुमाकर उसे फेंक देने तथा उसके बाद स्नान करने से बुद्धि भ्रम की संभावना नहीं रहती है।
इस दिन यम-तर्पण करने से भी बहुत शुभफल मिलते हैं परंतु तर्पण केवल घर के मुखिया को ही करना चाहिए। तर्पण का अर्थ है-शुद्ध जल में कच्चो तिल डालकर निम्नलिखित देवताओं का नाम लेकर नमस्कार करते हुए दोनों हाथों की अंजलि में जल भरकर दूसरे पात्र में डालना ही तर्पण कहलाता है।
यम तर्पण के मंत्र : ऊँ यमराजाय नम:, ऊँ धर्मराजाय नम:, ऊँ मृत्युवेनम:, ऊँ अन्तकाय नम:, ऊँ वैवस्वताय नम:, ऊँ कालाय नम:, ऊँ सर्वभूतक्षयाय नम:, ऊँ औदुम्बराय नम:, ऊँ दध्नाय नम:, ऊँ नीलाय नम:, ऊँ परमेष्ठिने नम:, ऊँ वृकोदराय नम:, ऊँ चित्राय नम:, ऊँ चित्रगुप्ताय नम:।
इन नामों से तर्पण करने पर अकाल मृत्यु का निवारण होता है। दरिद्रता दूर होती है तथा पितृदोष का निवारण एवं वंश की वृद्धि व रक्षा होती है।
भगवान कृष्ण ने इसी दिन नरकासुर नामक राक्षस का वध किया इसलिए इसे "नरक चतुर्दशी" भी कहते हैं।
हनुमत् पूजन: दीपावली से एक दिन पूर्व हनुमानजी के पूजन करने की भी परंपराएं रही हैं। देश के कुछ भागों में इस दिन हनुमान जी का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। इस चतुर्दशी को हनुमान जी सिंदूर का चोला चढ़ाकर, चूरमे का या आटे से बने किसी मीठे खाद्य पदार्थ का भोग लगाने से हनुमानजी प्रसन्न होते हैं और अज्ञात व अप्रत्यक्ष बाधाओं का निवारण कर देते हैं।
दीपावली : महालक्ष्मी का प्राकट्य इसी दिन हुआ। सायंकाल में महालक्ष्मी का पूजन किया जाता है, दीप जलाए जाते हैं और लक्ष्मीजी से घर में स्थिर रहने की प्रार्थना की जाती है।
लक्ष्मी पूजन में प्रयुक्त प्रसिद्ध मंत्र :
गणेश जी का मंत्र : ऊँ श्री गणेशाय नम:।
महाकाली (दवात के रूप में)
कालिके त्वं जगन्मातर्मसिरूपेण वर्तसे। उत्पन्ना त्वं च लोकानां व्यवहार प्रसिद्धये।।
लेखनी (पैन)
लेखनी निर्मिता पूर्व ब्राहम्णा परमेष्ठिना। लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम्।।
महासरस्वती पूजन (डायरी या बहीखातों पर)
या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभवस्त्रावृता
या वीणा वरदण्ड मण्डित करा या श्वेत पद्मासना।
या ब्रम्हा च्युत शंकर प्रभृतिभि: देवै:सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्यापहा।।

कुबेर पूजन (तिजोरी में)
धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च।
भगवत् त्वत्प्रसादेन धनधान्यादि सम्पद:।।
तराजू पूजन
नमस्ते सर्वदेवानां शक्तित्वे सत्यमाश्रिते।
साक्षीभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्वयोनिना।।

महालक्ष्मी पूजन
ऊँ सरसिजनिलये सरोज हस्ते, धवल तरांशुक गन्धमाल्य शोभे।
भगवति हरि वल्लभे मनोज्ञे, त्रिभुवन भूति करि प्रसीद मह्यम्।।

इस प्रकार इन मंत्रों से दीपावली पूजन कर लिया जाना चाहिए।
अन्नकूट महोत्सव : दीपावली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव मनाया जाता है। अन्नकूट में तरह-तरह के तेज मिर्च-मसालों से युक्त एवं मिष्ठान्न युक्त गरिष्ठ भोज्य पदार्थो का भगवान को भोग लगाया जाता है।
यम द्वितीया (भैया दूज) : दीपावली के बाद तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमद्वितीया पर्व मनाया जाता है। इसे भैयादूज भी कहते हैं। इस दिन बहिनें अपने भाइयों के मस्तक पर तिलक लगाकर उनके यश वृद्धि की कामना करती हैं वहीं भाई अपनी बहिनों को रक्षा की पूरी जिम्मेदारी का अहसास कराते हैं एवं उपहार स्वरूप, धन या वस्त्रादि देते हैं।
इस दिन बहिन के घर ही भोजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। किसी के बहिन नहीं हो तो वह अपनी बुआ या मौसी के यहाँ भी भोजन कर सकता है। पुराणों में कथा आती है कि यमराज और यमुना दोनों सगे भाई-बहिन हैं परंतु वर्ष में केवल एक बार ही एक-दूसरे से मिलते हैं।
यमराज भी वर्ष में एक बार, फुर्सत निकालकर प्रतिवर्ष इस दिन अपनी बहिन से मिलने आते हैं। यमराज भी यही कहते हैं कि इस दिन जो कोई अपनी बहिन को प्रसन्न करने के लिए उसके घर जाएगा, उसे उपहार देगा तथा उसी के हाथ से बना भोजन करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।
प्रत्येक बहिन दूज तिथि का पूजन करके यमराज से अपने भाइयों की दीर्घायु की प्रार्थना करती है और उन्हें तिलक लगाती है।
इस प्रकार भक्ति व आनंद के रस से ओत-प्रोत पाँच दिन के ये पाँच त्यौहार पूर्ण हो जाते हैं।

पद्मालक्ष्मी

लक्ष्मी का एक नाम पद्मा भी है। श्री सूक्त में माता लक्ष्मी के लिए पद्मस्थिता पद्मवर्णा पद्मिनी, पद्मालिनी पुण्करणीं, पद्मानना मद्मोरू, पद्माक्षी, पद्मसम्भवा, सरसिजनिलया, सरोजहस्तां, पद्मविपद्मपत्रा, पद्मप्रिया, पदमदलायताक्षी आदि पदों का प्रयोग हुआ है (परि. सूक्त 4 26) इससे पता चलता है कि लक्ष्मी देवी का पद्म (कमल) से बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। ये सुगन्धित कमल की माला पहनती है उसी को हाथ में रखती हैं और इसी पर निवास करना भी पसंद करती है। इनका वर्ण भी पद्म का सा है। क्योंकि ये स्वयं पद्म से उत्पन्न हुई है। पद्म की पंखुडी की भांति इनकी बडी-बडी लुभावनी आंखे है। हाथ, चरण, उरू आदि सब अवयव पद्म की भांति है। अत: इनका पद्मा नाम अन्वर्थक हैं।
इनका प्राकट्य समुन्द्र मंथन के अवसर पर हुआ था (महा0 आदि 18.34) विष्णु भगवान में इनकी परा अनुरक्ति थी। अत: इन्होनें पति के रूप में उन्हें ही वरण किया। वरण के अवसर पर जो माला इन्होनें उन्हें पहनायी थी वह पद्मों की ही थी। लक्ष्मी के अनेक रूप है। उनमें पद्मा विष्णु की अनुरागिनी रूपा है। गोपियों ने विष्णु के प्रति पद्मा के प्रेम की इस एकतानता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। पद्मा के अतिरक्त अन्य रूपों में ये ऎश्वर्य प्रदान करती हें, सम्पति का अम्बार लगा देती है और सर्वत्र शोभा का आधार करती है।
माता लक्ष्मी ने अपने बहुत से अवतारों में अपना नाम पद्मा या एतदर्धक शब्द ही रखा है। आकाशराज की अयोनिजा कन्या के रूप में जब ये अवतीर्ण हुई तब इनका नाम पद्मावती, पद्मिनी और पद्मालया रखा गया (स्कन्द पु0 वै0 स्व0 भूमिवाराह खण्ड) भगवान जब कल्किका अवतार ग्रहण करते है, तब लक्ष्मी का नाम पkा ही होता है। कल्किपुराण में भी इनकी पद्मप्रियता को द्योतित करने के लिये पद्मघटित बहुत से पद दिये गये हैं।
माता पद्मा के कृपाकटाक्ष -पात मात्र से समस्त अनर्थौ की निवृति होकर सब सुख -सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है। पुराणों में वर्णन आता है कि एक बार दुर्वासा के शाप से देवता श्रीहीन हो गये। ये व्याकुली होकर इधर-उधर भागने लगे। अमरावती पर दैत्यों का अधिकार हो गया। घबराकर ब्रम्हा आदि देवता विष्णु की शरण में गये। विष्णु की सन्मति से समुद्र का मंथन हुआ, जिससे माता पद्मा का आर्विभाव हुआ । देवता माता पद्मा के चरणों पर लोट गये। माता पद्मा ने देवताओं के भय को दूर करने के लिए उनके भवनों पर दृष्टि डाल दी । बस इतने से अमरावती दैत्यों से खाली होकर सज-धज गयी। देवताओं को अपने प्रासाद पहले से भी अधिक मनोरम दिख पडें। उन्हें पता ही नहीं चला कि दो क्षण पूर्व ही वे कितने विपन्न और उद्विग थे। उस समय देवराज इन्द्र ने जो स्तुति की थी उसमें भी उन्होनें पद्मबहुल पदों का विन्यास किया-
पद्मपत्रेक्षणायैं च पद्मास्यायै नमो नम:।
पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नम:||

माता पद्मा के आवाहन में जो श्लोक पढ़ा जाता है, उससे भी पद्मा नाम की अन्वर्थता प्रकट होती है। उसमें बताया गया है कि पद्मा का सुख कमल की भांति है। वे कमल की मालाओं पर बैठती है और कमलों में ही रहती है-
पद्मिनी पद्मवदना पद्ममालोपरिस्थिताम्।
जगत्प्रियां पद्मवासां पद्मामावाहयाम्यहम् ||

आवाहन का एक अन्य मंत्र इस प्रकार भी मिलता हे-
सुवणाभां पद्महस्तां विष्णोर्वक्ष: स्थलस्थिताम्।
त्रैलोक्यपूजितां देवी पद्मामावाहयाम्यहम् ||

इससे ध्वनित होता है कि पद्मा रूप से ये निरन्तर श्री विष्णु के वक्ष-स्थल पर ही निवास किया करती है। ऎश्वर्य लक्ष्मी या धन लक्ष्मी की भांति कहीं अन्यत्रा नहीं जाती है।