धनतेरस : दीपावली से दो दिन पूर्व "कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी" धनतेरस कहलाती है। धन की देवी लक्ष्मी का इस तिथि से अटूट संबंध है। इस दिन चाँदी के बर्तन, सिक्के व आभूषणादि खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है।
इस दिन सायंकाल में यमराज की प्रसन्नता के लिए घर के मुख्य दरवाजे पर दीपक जलाया जाता है। यमराज मृत्यु के देवता हैं और इस दिन दीपक जलाने से वे प्रसन्न होते हैं। इस पर्व के महत्व को बताते हुए यमराज ने स्वयं कहा है -
"कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे। यमदीपं बहिर्दद्यादमपमृत्युर्विनश्यति।।"
अर्थात् कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी को जो सायंकाल में दीपदान करेगा उसकी अकाल मृत्यु नहीं होगी।
धनतेरस को भगवान धन्वन्तरि का भी अवतार हुआ था। धन्वन्तरि देव सृष्टि के सर्वप्रथम चिकित्सक होने के नाते चिकित्सक वर्ग के प्रमुख आराध्य देव हैं। चिकित्सक वर्ग इस दिन धन्वन्तरि देव की पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी सफलता के लिए आशीर्वाद की याचना करते हैं तथा प्रसाद लेकर जनता के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते हैं। भगवान धन्वन्तरि को औषध अवतार भी माना जाता है क्योंकि ये औषधियों को लेकर ही प्रकट हुए थे। प्रकृति में व्याप्त समस्त औषधियों का इन्हें संपूर्ण ज्ञान था जिसे समय-समय पर इन्होंने सत्पात्रों को प्रदान किया।
नरक चतुर्दशी: इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं। लक्ष्मी जी की ब़डी बहिन अलक्ष्मी या दरिद्रा इस दिन प्रकट हुईं थीं। पुराणों के अनुसार कार्तिक मास में शरीर पर तेल मालिश नहीं की जाती परंतु इस दिन तेल की मालिश करके स्नान करना शुभ बताया है क्योंकि इससे अलक्ष्मी का प्रभाव नहीं प़डता और दरिद्रता दूर रहती है।
अपामार्ग पौधे की पत्तों से युक्त डाली को अपने सिर पर घुमाकर उसे फेंक देने तथा उसके बाद स्नान करने से बुद्धि भ्रम की संभावना नहीं रहती है।
इस दिन यम-तर्पण करने से भी बहुत शुभफल मिलते हैं परंतु तर्पण केवल घर के मुखिया को ही करना चाहिए। तर्पण का अर्थ है-शुद्ध जल में कच्चो तिल डालकर निम्नलिखित देवताओं का नाम लेकर नमस्कार करते हुए दोनों हाथों की अंजलि में जल भरकर दूसरे पात्र में डालना ही तर्पण कहलाता है।
यम तर्पण के मंत्र : ऊँ यमराजाय नम:, ऊँ धर्मराजाय नम:, ऊँ मृत्युवेनम:, ऊँ अन्तकाय नम:, ऊँ वैवस्वताय नम:, ऊँ कालाय नम:, ऊँ सर्वभूतक्षयाय नम:, ऊँ औदुम्बराय नम:, ऊँ दध्नाय नम:, ऊँ नीलाय नम:, ऊँ परमेष्ठिने नम:, ऊँ वृकोदराय नम:, ऊँ चित्राय नम:, ऊँ चित्रगुप्ताय नम:।
इन नामों से तर्पण करने पर अकाल मृत्यु का निवारण होता है। दरिद्रता दूर होती है तथा पितृदोष का निवारण एवं वंश की वृद्धि व रक्षा होती है।
भगवान कृष्ण ने इसी दिन नरकासुर नामक राक्षस का वध किया इसलिए इसे "नरक चतुर्दशी" भी कहते हैं।
हनुमत् पूजन: दीपावली से एक दिन पूर्व हनुमानजी के पूजन करने की भी परंपराएं रही हैं। देश के कुछ भागों में इस दिन हनुमान जी का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। इस चतुर्दशी को हनुमान जी सिंदूर का चोला चढ़ाकर, चूरमे का या आटे से बने किसी मीठे खाद्य पदार्थ का भोग लगाने से हनुमानजी प्रसन्न होते हैं और अज्ञात व अप्रत्यक्ष बाधाओं का निवारण कर देते हैं।
दीपावली : महालक्ष्मी का प्राकट्य इसी दिन हुआ। सायंकाल में महालक्ष्मी का पूजन किया जाता है, दीप जलाए जाते हैं और लक्ष्मीजी से घर में स्थिर रहने की प्रार्थना की जाती है।
लक्ष्मी पूजन में प्रयुक्त प्रसिद्ध मंत्र :
गणेश जी का मंत्र : ऊँ श्री गणेशाय नम:।
महाकाली (दवात के रूप में)
कालिके त्वं जगन्मातर्मसिरूपेण वर्तसे। उत्पन्ना त्वं च लोकानां व्यवहार प्रसिद्धये।।
लेखनी (पैन)
लेखनी निर्मिता पूर्व ब्राहम्णा परमेष्ठिना। लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम्।।
महासरस्वती पूजन (डायरी या बहीखातों पर)
या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभवस्त्रावृता
या वीणा वरदण्ड मण्डित करा या श्वेत पद्मासना।
या ब्रम्हा च्युत शंकर प्रभृतिभि: देवै:सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्यापहा।।
कुबेर पूजन (तिजोरी में)
धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च।
भगवत् त्वत्प्रसादेन धनधान्यादि सम्पद:।।
तराजू पूजन
नमस्ते सर्वदेवानां शक्तित्वे सत्यमाश्रिते।
साक्षीभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्वयोनिना।।
महालक्ष्मी पूजन
ऊँ सरसिजनिलये सरोज हस्ते, धवल तरांशुक गन्धमाल्य शोभे।
भगवति हरि वल्लभे मनोज्ञे, त्रिभुवन भूति करि प्रसीद मह्यम्।।
इस प्रकार इन मंत्रों से दीपावली पूजन कर लिया जाना चाहिए।
अन्नकूट महोत्सव : दीपावली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव मनाया जाता है। अन्नकूट में तरह-तरह के तेज मिर्च-मसालों से युक्त एवं मिष्ठान्न युक्त गरिष्ठ भोज्य पदार्थो का भगवान को भोग लगाया जाता है।
यम द्वितीया (भैया दूज) : दीपावली के बाद तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमद्वितीया पर्व मनाया जाता है। इसे भैयादूज भी कहते हैं। इस दिन बहिनें अपने भाइयों के मस्तक पर तिलक लगाकर उनके यश वृद्धि की कामना करती हैं वहीं भाई अपनी बहिनों को रक्षा की पूरी जिम्मेदारी का अहसास कराते हैं एवं उपहार स्वरूप, धन या वस्त्रादि देते हैं।
इस दिन बहिन के घर ही भोजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। किसी के बहिन नहीं हो तो वह अपनी बुआ या मौसी के यहाँ भी भोजन कर सकता है। पुराणों में कथा आती है कि यमराज और यमुना दोनों सगे भाई-बहिन हैं परंतु वर्ष में केवल एक बार ही एक-दूसरे से मिलते हैं।
यमराज भी वर्ष में एक बार, फुर्सत निकालकर प्रतिवर्ष इस दिन अपनी बहिन से मिलने आते हैं। यमराज भी यही कहते हैं कि इस दिन जो कोई अपनी बहिन को प्रसन्न करने के लिए उसके घर जाएगा, उसे उपहार देगा तथा उसी के हाथ से बना भोजन करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।
प्रत्येक बहिन दूज तिथि का पूजन करके यमराज से अपने भाइयों की दीर्घायु की प्रार्थना करती है और उन्हें तिलक लगाती है।
इस प्रकार भक्ति व आनंद के रस से ओत-प्रोत पाँच दिन के ये पाँच त्यौहार पूर्ण हो जाते हैं।
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Monday, October 19, 2009
दीपावली और लक्ष्मीजी की प्रसन्नता
इस दिन लक्ष्मीजी का पूजन कर भाँति-भाँति के व्यंजनों से भोग लगाया जाता है। घर में उत्सव स्वरूप घी और तेल के दीपक जलाये जाते हैं। विष्णु पुराण में आया है -
""तदह्नि पद्म शय्यां य: पद्मा सौख्य विवृद्धये। कुर्यातस्य गृहं मुक्त्वा तत्पद्मा क्वापि व व्रजेत्।।
न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुख सुप्तिकाम्। धन चिन्ता विहिनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि।।""
अर्थात् कमल पुष्पों व दीपकों से जो महालक्ष्मी जी को पूजता है उसके घर को छो़डकर लक्ष्मीजी कभी नहीं जाती परंतु जो इस प्रकार लक्ष्मीजी का पूजन नहीं करते वे नित्य ही धन की चिंता से युक्त होकर सोते हैं। नये कप़डे पहनकर और विविध श्रृंगारिक पदार्थो को उपयोग में लेकर लक्ष्मी पूजा करनी चाहिए।
सायंकाल में एक तेल के दीपक को अपने सिर के ऊपर घुमाकर, उस दीपक को चौराहे, मंदिर, वृक्ष के नीचे, पर्वत पर, घर के बाहर मुख्य द्वार पर या चबूतरे पर रखने से अरिष्टों का निवारण होता है।
इस दिन आधी रात के समय सूप (छाज़डा) को बाँस की डण्डी से बजाते हुए घर के चौक की झाडू लगाकर कचरे को घर के बाहर फेंकते हुए प्रार्थना की जाती है कि - ""अलक्ष्मी हमारे घर से बाहर निकल जाये और लक्ष्मीजी स्थायी रूप से निवास करें।""
दीपावली की रात्रि को कालरात्रि माना गया है। श्री विद्यार्णव तंत्र में कालरात्रि को महाशक्ति का एक रूप माना गया है तथा कालरात्रि शक्ति को श्रीविद्या का एक अंग कहा गया है। आदि शंकराचार्य श्रीविद्या के परम उपासक थे। कालरात्रि देवी को "गणेश्वरी देवी" भी कहा गया है जो कि ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करती हैं।
दीपावली की रात में रात्रि 12 बजे से 2 बजे तक के समय को अर्थात् तृतीय प्रहर मध्य को "महानिशा" काल कहते हैं। इस समय (सिंह लग्न में) लक्ष्मी आराधना व पूजा करने का अत्यधिक महत्व होता है। सामान्यतया दीपावली को प्रदोष काल में श्रीलक्ष्मी जी का, गणेश जी, सरस्वती, कुबेर और वरूण आदि देवताओं के साथ पूजन किया जाता है परंतु "महानिशा" काल में देवी लक्ष्मीजी का भगवान नारायण के साथ अर्थात् "लक्ष्मी-नारायण" भगवान का संयुक्त पूजन पुरूष सूक्त व श्रीसूक्त के मंत्रों के साथ करना अत्यंत शुभ होता है।
पौराणिक मान्यताएं रही हैं कि - ""कार्तिक अमावस्या को मध्य रात्रि में देवी लक्ष्मी अपने स्वामी भगवान नारायण के साथ गरू़ड पर सवार होकर विश्व-भ्रमण के लिए निकलती हैं तथा जिस घर में अपना पूजन होते हुए देखती हैं, उस घर पर कृपा कर देती हैं इसीलिए इस रात्रि में लक्ष्मी नारायण भगवान का पूजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।""
दीपावली की रात्रि में निम्न मंत्र का जाप अत्यधिक शुभ होता है।
मंत्र : ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी ममगृहे आगच्छ-आगच्छ ह्रीं नम:।।
विधि : दीपावली को प्रदोष काल में जबकि परंपरागत रूप से लक्ष्मी पूजन कर लिया जाता है तो उसके बाद यह व्यवस्था करनी चाहिए, पूजा का दीपक अखण्ड रहे और प्रात:काल तक चलता रहे। तब एक चाँदी की थाली में या बहीखाते में सीधे हाथ की तरफ वाले पृष्ठ पर अष्टगंध या कुंकुम से इस मंत्र को लिखना चाहिए और चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप से पूजना चाहिए और मावे का भोग लगाना चाहिए परंतु पूजा करते समय सावधानी रखनी चाहिए कि लिखा हुआ मंत्र मिटे नहीं। पूजन के बाद संपूर्ण रात्रि में इस मंत्र का कुल 12,000 (बारह हजार) बार जाप करें। इस अनुष्ठान से माँ लक्ष्मी अतिप्रसन्न होती हैं और जाप करने वाले को धन-दौलत और सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं। परिवार के सभी लोग सामूहिक रूप से मंत्र का जाप कर इस संख्या को पूरी कर सकते हैं।
व्यापारिक घाटा मिटाने के लिए मंत्र : ऊँ ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीमेव कुरू कुरू वांछितमेव ह्रीं ह्रीं नम:।
यदि व्यापार में लगातार घाटा चल रहा हो, दुकान ठीक से नहीं चलती हो तथा धन के आवागमन में लगातार रूकावटें आती हों तो इस मंत्र को प्रयोग में लेना चाहिए।
दीपावली की रात्रि में चाँदी के पत्र पर अथवा भोजपत्र पर अष्टगंध से इस मंत्र को शुद्ध वर्तनी में लिख लेना चाहिए। महालक्ष्मी का सुंदर चित्र, लाल कप़डे के आसन पर रखकर, अखंड दीपक जलाकर पूजन करें और पूजा के बाद इस मंत्र का 10,000 बार (100 माला) जाप करें। जाप परिवार के अन्य सदस्य भी कर सकते हैं। सभी की जाप संख्या गिनती में शामिल होती हैं। इस प्रकार यह मंत्र चैतन्य हो जाता है फिर प्रतिदिन लक्ष्मीजी का पूजन करते हुए, दीपक व धूपबत्ती जलाकर तथा मावे का यथाशक्ति मात्रा में भोग लगाकर, इस मंत्र का 108 बार जाप करते रहें तो घाटे में चल रहा व्यापार धीरे-धीरे लाभ में आने लगता है। लगभग 41 दिनों में इसके प्रभाव दिखाई देने लगते हैं।
श्री घंटाकर्ण-द्रव्य प्राप्ति मंत्र
मंत्र - ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं क्रौं ऊँ घंटाकर्ण महावीर लक्ष्मीं पूरय पूरय सुख सौभाग्यं कुरू कुरू स्वाहा।
विधि - स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर इस मंत्र को भोजपत्र पर सुंदर और स्पष्ट अक्षरों में केसर-चंदन से लिख लेवें और पूजन करके इस मंत्र का दीपावली के समय तीन दिन तक अलग-अलग संख्या में जाप करें। जैन धर्म में इस मंत्र की ब़डी उपयोगिता है।
धन तेरस के दिन 40 माला, रूप चौदस (नरक चतुर्दशी) को 42 माला एवं दीपावली को 43 माला जाप करें और फिर भोजपत्र पर लिखे मंत्र को अपनी तिजोरी में रख लेवें। जाप उत्तर दिशा की ओर मुख करके ही करना चाहिये तथा सफेद वस्त्र, सफेद ऊनी आसन व लाल माला को प्रयोग में लेना चाहिये।
ऎसा करने से अगला वर्ष धन प्राप्ति की दृष्टि से बहुत अच्छा जाता है। व्यापार की वृद्धि होती है। इस प्रकार दीपावली की परम पुनीत महारात्रि में अपनी कामना के अनुरूप मंत्र प्रयोग में लेने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और कामनाओं की पूर्ति करती हैं।
धन की अधिष्ठात्री देवी "लक्ष्मी"
लक्ष्मी ने सर्वगुण सम्पन्न भगवान् विष्णु का वरण किया। अत: यह हरिप्रिया, विष्णुप्रिया, श्री, इन्दिरा आदि नामों से प्रसिद्ध हुई। भगवान् विष्णु के अन्य नाम भी लक्ष्मीपति तथा लक्ष्मीकान्त विख्यात हुए। उमा, राधा और तुलसी के रूप में भी लक्ष्मी के अवतार क्रमश: शिव, कृष्ण और शलिग्राम की अर्धागिनी के रूप में हुए। लक्ष्मी परमतत्व परमात्मा की एक शक्ति है। परमात्मा की सत्, रज और तम रूपा तीन शक्तियां क्रमश: सरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूपों में हैं। महालक्ष्मी प्रवर्तक शक्ति हैं अत: प्राणियों में आकर्षण, लोभ और आसक्ति उत्पन्न करती हैं। विष्णु परम चैतन्य पालक तत्व प्रधान रजोगुण युक्त हैं और इस हेतु योग सामग्री अर्थात् धन, सम्पत्ति आवश्यक होती है। सम्पत्ति लक्ष्मी का आधिभौतिक रूप होता है।
लक्ष्मी भौतिक सम्पत्ति के साथ ही आन्तरिक सम्पत्ति जैसे सौहाद्रü, उत्साह, प्रेम, करूणा, रसिकता और सौन्दर्य की भी अधिष्ठात्री देवी हैं।
महालक्ष्मी कंचनवर्ण, अतिसुन्दरी और अक्षतभग (चिरयौवना) रहने वाली हैं। लक्ष्मीजी की प्रतिमाएं द्विभुजा और चतुर्भुजा होती हैं। द्विभुजा वाली प्रतिमाओं के हाथों में शंख, पद्म तथा चतुर्भुजा प्रतिमाओं के हाथों में क्रमश: शंख, पद्म, अमृतघट और बिल्वफल रहते हैं। शंख अहंकार और जयकोष का, पद्म सौन्दर्य, अनासक्ति और मार्दव का, अमृतघट आनन्द का तथा बिल्वफल भोग का प्रतीक माना गया है।
महालक्ष्मी की मूर्तियां अनेक रूपों में उपलब्ध हैं। जैसे गजलक्ष्मी, दीपलक्ष्मी, गजारूढ़ा, शेषशैया पर श्री विष्णु की चरण सेवा करती हुई, उलूक वाहिनी लक्ष्मी, लक्ष्मीनारायण और गरू़ड वाहनी आदि। उलूक पक्षी महालक्ष्मी का वाहन माना गया है।
लक्ष्मी-पूजन दीपावली त्यौहार के अवसर पर होता है। दीपावली को लक्ष्मी-पूजन का त्यौहार भी कहते हैं। वर्षा में फसल पक कर घर धन-धान्य से पूर्ण हो जाता है। लक्ष्मी पर्व अर्थात् दीपावली भारतवर्ष का प्रमुख त्यौहार माना जाता है।
इसी संदर्भ में दीपावली को धनाध्यक्ष कुबेर की आराधना और पूजन करने की परंपराएं भी रही हैं। कुबेर संसार की समस्त निधियों के राजा माने जाते हैं। इन नौ निधियों को पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस के नाम से जाना जाता है। इन नौ निधियों की सिद्धि पदि्मनी विद्या के द्वारा होती है क्योंकि पदि्मनी विद्या के अधिष्ठाता स्वयं कुबेर ही हैं। महाभारत में एक स्थान पर उल्लेख है कि - महाराज कुबेर के साथ भार्गव शुक्र तथा धनिष्ठा नक्षत्र भी दिखाई प़डते हैं। इन तीनों की पूर्ण कृपा हुए बिना अनंत वैभव या गुप्त निधि की प्राप्ति नहीं होती इसलिए वैभव और ऎश्वर्य की प्राप्ति के लिए इन तीनों की संयुक्त उपासना का विधान है। महालक्ष्मी भार्गवसुता या भार्गवा भी कहलाती हैं।
कुबेर पूर्वजन्म मे एक वेदज्ञ ब्राम्हण थे और पुनर्जन्म में वे रावण की सौतेली माँ इडविडा के गर्भ से उत्पन्न हुए और इन्होंने ब्रम्हा जी की आराधना की। इनकी आराधना से प्रसन्न होकर ब्रम्हाजी ने इन्हें उत्तर दिशा का दिक्पाल घोषित किया और पुष्पक विमान प्रदान करते हुए धनाध्यक्ष का पद प्रदान किया। घर की मुख्य तिजोरी में कुबेर देवता का पूजन किया जाता है।
ऊँ वैश्रवणाय स्वाहा।
ऊँ श्रीं ऊँ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नम:।
ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।
इन मंत्रों का जाप धन त्रयोदशी को और दीपावली को करने से कुबेर अत्यधिक प्रसन्न होते हैं और खजाना भरा रखते हैं।
व्रत कल्पद्रुम आदि ग्रंथों में कुबेर साधना के लिए फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी से वर्ष भर प्रतिमास शुक्ल त्रयोदशी को कुबेर व्रत किया जाता है। इस व्रत में कुबेर देव की पूजा उपरोक्त मंत्रों से की जाती है और इन्हीं मंत्रों का जाप किया जाता है। इस व्रत को कर लेने से तिजोरी भरी रहती है और लक्ष्मी स्थिर रूप से निवास करती है।
पद्मालक्ष्मी
लक्ष्मी का एक नाम पद्मा भी है। श्री सूक्त में माता लक्ष्मी के लिए पद्मस्थिता पद्मवर्णा पद्मिनी, पद्मालिनी पुण्करणीं, पद्मानना मद्मोरू, पद्माक्षी, पद्मसम्भवा, सरसिजनिलया, सरोजहस्तां, पद्मविपद्मपत्रा, पद्मप्रिया, पदमदलायताक्षी आदि पदों का प्रयोग हुआ है (परि. सूक्त 4 26) इससे पता चलता है कि लक्ष्मी देवी का पद्म (कमल) से बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। ये सुगन्धित कमल की माला पहनती है उसी को हाथ में रखती हैं और इसी पर निवास करना भी पसंद करती है। इनका वर्ण भी पद्म का सा है। क्योंकि ये स्वयं पद्म से उत्पन्न हुई है। पद्म की पंखुडी की भांति इनकी बडी-बडी लुभावनी आंखे है। हाथ, चरण, उरू आदि सब अवयव पद्म की भांति है। अत: इनका पद्मा नाम अन्वर्थक हैं।
इनका प्राकट्य समुन्द्र मंथन के अवसर पर हुआ था (महा0 आदि 18.34) विष्णु भगवान में इनकी परा अनुरक्ति थी। अत: इन्होनें पति के रूप में उन्हें ही वरण किया। वरण के अवसर पर जो माला इन्होनें उन्हें पहनायी थी वह पद्मों की ही थी। लक्ष्मी के अनेक रूप है। उनमें पद्मा विष्णु की अनुरागिनी रूपा है। गोपियों ने विष्णु के प्रति पद्मा के प्रेम की इस एकतानता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। पद्मा के अतिरक्त अन्य रूपों में ये ऎश्वर्य प्रदान करती हें, सम्पति का अम्बार लगा देती है और सर्वत्र शोभा का आधार करती है।
माता लक्ष्मी ने अपने बहुत से अवतारों में अपना नाम पद्मा या एतदर्धक शब्द ही रखा है। आकाशराज की अयोनिजा कन्या के रूप में जब ये अवतीर्ण हुई तब इनका नाम पद्मावती, पद्मिनी और पद्मालया रखा गया (स्कन्द पु0 वै0 स्व0 भूमिवाराह खण्ड) भगवान जब कल्किका अवतार ग्रहण करते है, तब लक्ष्मी का नाम पkा ही होता है। कल्किपुराण में भी इनकी पद्मप्रियता को द्योतित करने के लिये पद्मघटित बहुत से पद दिये गये हैं।
माता पद्मा के कृपाकटाक्ष -पात मात्र से समस्त अनर्थौ की निवृति होकर सब सुख -सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है। पुराणों में वर्णन आता है कि एक बार दुर्वासा के शाप से देवता श्रीहीन हो गये। ये व्याकुली होकर इधर-उधर भागने लगे। अमरावती पर दैत्यों का अधिकार हो गया। घबराकर ब्रम्हा आदि देवता विष्णु की शरण में गये। विष्णु की सन्मति से समुद्र का मंथन हुआ, जिससे माता पद्मा का आर्विभाव हुआ । देवता माता पद्मा के चरणों पर लोट गये। माता पद्मा ने देवताओं के भय को दूर करने के लिए उनके भवनों पर दृष्टि डाल दी । बस इतने से अमरावती दैत्यों से खाली होकर सज-धज गयी। देवताओं को अपने प्रासाद पहले से भी अधिक मनोरम दिख पडें। उन्हें पता ही नहीं चला कि दो क्षण पूर्व ही वे कितने विपन्न और उद्विग थे। उस समय देवराज इन्द्र ने जो स्तुति की थी उसमें भी उन्होनें पद्मबहुल पदों का विन्यास किया-
पद्मपत्रेक्षणायैं च पद्मास्यायै नमो नम:।
पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नम:||
माता पद्मा के आवाहन में जो श्लोक पढ़ा जाता है, उससे भी पद्मा नाम की अन्वर्थता प्रकट होती है। उसमें बताया गया है कि पद्मा का सुख कमल की भांति है। वे कमल की मालाओं पर बैठती है और कमलों में ही रहती है-
पद्मिनी पद्मवदना पद्ममालोपरिस्थिताम्।
जगत्प्रियां पद्मवासां पद्मामावाहयाम्यहम् ||
आवाहन का एक अन्य मंत्र इस प्रकार भी मिलता हे-
सुवणाभां पद्महस्तां विष्णोर्वक्ष: स्थलस्थिताम्।
त्रैलोक्यपूजितां देवी पद्मामावाहयाम्यहम् ||
इससे ध्वनित होता है कि पद्मा रूप से ये निरन्तर श्री विष्णु के वक्ष-स्थल पर ही निवास किया करती है। ऎश्वर्य लक्ष्मी या धन लक्ष्मी की भांति कहीं अन्यत्रा नहीं जाती है।
इनका प्राकट्य समुन्द्र मंथन के अवसर पर हुआ था (महा0 आदि 18.34) विष्णु भगवान में इनकी परा अनुरक्ति थी। अत: इन्होनें पति के रूप में उन्हें ही वरण किया। वरण के अवसर पर जो माला इन्होनें उन्हें पहनायी थी वह पद्मों की ही थी। लक्ष्मी के अनेक रूप है। उनमें पद्मा विष्णु की अनुरागिनी रूपा है। गोपियों ने विष्णु के प्रति पद्मा के प्रेम की इस एकतानता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। पद्मा के अतिरक्त अन्य रूपों में ये ऎश्वर्य प्रदान करती हें, सम्पति का अम्बार लगा देती है और सर्वत्र शोभा का आधार करती है।
माता लक्ष्मी ने अपने बहुत से अवतारों में अपना नाम पद्मा या एतदर्धक शब्द ही रखा है। आकाशराज की अयोनिजा कन्या के रूप में जब ये अवतीर्ण हुई तब इनका नाम पद्मावती, पद्मिनी और पद्मालया रखा गया (स्कन्द पु0 वै0 स्व0 भूमिवाराह खण्ड) भगवान जब कल्किका अवतार ग्रहण करते है, तब लक्ष्मी का नाम पkा ही होता है। कल्किपुराण में भी इनकी पद्मप्रियता को द्योतित करने के लिये पद्मघटित बहुत से पद दिये गये हैं।
पद्मपत्रेक्षणायैं च पद्मास्यायै नमो नम:।
पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नम:||
माता पद्मा के आवाहन में जो श्लोक पढ़ा जाता है, उससे भी पद्मा नाम की अन्वर्थता प्रकट होती है। उसमें बताया गया है कि पद्मा का सुख कमल की भांति है। वे कमल की मालाओं पर बैठती है और कमलों में ही रहती है-
पद्मिनी पद्मवदना पद्ममालोपरिस्थिताम्।
जगत्प्रियां पद्मवासां पद्मामावाहयाम्यहम् ||
आवाहन का एक अन्य मंत्र इस प्रकार भी मिलता हे-
सुवणाभां पद्महस्तां विष्णोर्वक्ष: स्थलस्थिताम्।
त्रैलोक्यपूजितां देवी पद्मामावाहयाम्यहम् ||
इससे ध्वनित होता है कि पद्मा रूप से ये निरन्तर श्री विष्णु के वक्ष-स्थल पर ही निवास किया करती है। ऎश्वर्य लक्ष्मी या धन लक्ष्मी की भांति कहीं अन्यत्रा नहीं जाती है।
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